मन्दिर तुम्हारा ही प्रतिरूप है।
पद्मासन में तुम्हारी मुद्रा मन्दिर की ही प्रतिकृति (नकल) है।
जैसे आलथी-पालथी के जैसा चबूतरा,
धड़ जैसा चबूतरे पर मन्दिर का गोल कमरा,
सिर के जैसा गुम्बद, जूड़े जैसी कलश, कान और
आँख जैसी खिड़कियाँ, मुख जैसा दरवाजा,
आत्मा जैसी मूर्ति और मन जैसा पुजारी |
तुम्हारी देह-मन्दिर में विदेही-परमात्मा बैठा है।
उस परमात्मा को पहचानना ही
इस देह-मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा है।