हरि भगत




श्री बलराम सिंह यादव
सेवा निवृत्त अध्यापक

सब कर फल हरिभगति सुहाई । सो बिनु संत न काहू पाई ||
अस बिचारि जोई कर सतसंगा | रामभगति तेहिं सुलभ बिहंगा ||

। श्रीरामचरितमानस |

सभी साधनों का फल सुन्दर रामभक्ति है जो बिना सन्त के किसी ने प्राप्त नहीं की | हे गरूड़जी ! ऐसा
विचारकर जो सत्संग करता है उसे प्रभु श्री रामजी की भक्ति सुगमता से प्राप्त हो जाती है।

।। जय सियाराम जय जय सियाराम ||

भावार्थ :- यहाँ सभी साधनों का फल प्रभुश्री रामजी की भक्ति प्राप्त करना है। यहा,,

जप तप मख सम दम व्रत दाना | बिरति बिबेक जोग बिग्याना |।
सब कर फल रघुपति पद प्रेमा | तेहि बिनु कोउ न पावइ क्षेमा ||

तथा

जप तप नियम जोग निज धर्मा । श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा ||
ग्यान दया दम तीरथ मज्जन । जँह लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन |।
आगम निगम पुरान अनेका । पढ़े सुने कर फल प्रभु एका ||
तव पद पंकज प्रीति निरंतर | सब साधन कर यह फल सुंदर |।

पुनश्च

तीर्थाटन साधन समुदाई । जोग बिराग ज्ञान निपुनाई |।
नाना कर्म धर्म ब्रत दाना | संजम दम जप तप मख नाना |।
भूत दया द्विज गुर सेवकाई । बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई ।।
जूँह लगि साधन बेद बखानी | सब कर फल हरिभगति भवानी |।

उपर्युक्त सभी प्रसंगों में साधनों को वृक्ष और भगवान की भक्ति को फल कहा गया है। अर्थात विभिन्‍न प्राकर के कर्म व ज्ञान आदि को वृक्षों के पत्ते, शाखाएँ व फूल आदि कहा गया है और प्रभु श्री रामजी की भक्ति को रसयुकत फल कहा गया है।

प्रभु श्री की भक्ति प्राप्त करने के लिए सत्संग को अनिवार्य बताया गया है क्‍योंकि सत्संग ही प्रथम भक्ति है। यथा - प्रथम भगति संतनन्‍्ह कर संगा । सत्संग भी भगवान की कूपा से ही प्राप्त होता है। यथा -

संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही | चितवहिं राम कृपा करि जेहीं ।।

लँका में विभीषणजी ने श्री हनुमान जी से यही कहा थ -

अब मोहि भा भरोस हनुमंता । बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता ।।

विनय पत्रिका में भी गो0 जी कहते है-

जब द्रवै दीनदयालु राघव साधु-संगति पाइये | जेहि दरस-परस-समागमादिक पापरासि नसाइये ।।

अत: निष्कर्ष रूप से यह कहा जा सकता है कि बिना सन्त अथवा सत्संग के प्रभु श्री रामजी की भक्ति प्राप्त नही की जा सकती है।

।। जय राधा माधव जय कुंज बिहारी || || जय गोपी जन वललभ जय गिरिधर हरी ।।


राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ।।


प्रभु सेवा परिवार


( इंडिया ट्रस्ट एक्ट, 1882 के तहत निगमित एक
धार्मिक ट्रस्ट पंजिकरण संख्या 1537 /2021)