सुमति कुमति सब के उर रहहीं | जे,
नाथ पुरान निगम अस कहहीं ।।
मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने यह वर्णन किया है। वास्तव में हम आप सभी के भीतर सुमति और कुमति अवश्य ही बसती है। एक बार की बात है सुमति और कुमति में आपस में झगड़ा होने लगा कि दोनों एक दूसरे से अपने को अच्छा कह रही थी । दोनों बहनें आपस में लड़ाई-झगड़ा कर ही रही थी तभी दोनों ने आपस में कहा कि चलो - पिता जी के पास चले और निर्णय हो जाएगा कि दोनो में कौन अच्छा है तब दोनों अपने पिता ब्रह्मा जी के पास गई और अपने-अपने को अच्छा होने का निर्णय देने को कहा तब ब्रह्मा जी ने कहा कि तुम दोनो ही अच्छी हो तो दोनों नें कहा कि नहीं आप दोनों में से किसी एक को ही अच्छा कहें। तब ब्रह्माजी ने कहा कि तुम दोनों थोड़ा सा दस-बीस कदम चल के दिखाओ तो दोनों बहनें पिता के आज्ञानुसार आगें चल कर वापस लौट आई, फिर पिता जी से बोली कि अब बताइये कि कौन अच्छी है, तब ब्रह्मा जी ने कहा कि कुमति बेटी तुम जब यहां से जा रही थी तो बहुत अच्छी लग रही थी तथा सुमति तुम जब वापस आ रही थी तो अच्छी लग रही थी, तुम दोनो ही अच्छी हो अर्थात मनुष्य के जीवन से कुमति दूर चले जाने में तथा सुमति के आ जाने पर ही भलाई है, सुमति का अर्थ है सद्गुण तथा कूमति का अर्थ है दुर्गुण इसी लिए एक जगह प्रारम्भ में ही पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी ने यह कहा है कि -
बंदऊ संत असज्जन चरना |
दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना |।
विछुरत एक प्रान हर लेही।
मिलत एक दारूण दुख देही |।
अर्थात संत जनों के साथ रहने पर अत्यन्त सुख की अनुभूति होती है तथा कभी उनका साथ छूट जाने पर अत्यन्त कष्ट होता है। इसी प्रकार दुष्ट व्यक्ति के आ जाने पर ही अत्यधिक दुख हो जाता है तथा ऐसा लगने लगता है कि यह कितना जल्दी यहाँ से चला जाय | कहने का तात्पर्य यह है कि सुमति बुद्धि का जो संत है-- उसके आने में ही खुशी होती है तथा दुष्ट बुद्धि कुमति विचार वाले को जाने में ही अत्यन्त प्रसन्नता आती है। इसलिए सदैव संतो का साथ ही करना चाहिये तथा असज्जन लोंगो से हमेशा दूरी बनाए रखना चाहिए |
सुमति का सेवन तथा कूमति से परहेज ही मनुष्य को ऊँचा उठा सकता है। सभी को राम कथा (भगवान की कथा) जो कथामृत है सदैव पीना चाहिए | रामकथा अति पुरातन अति प्राचीन है, साथ ही साथ रामकथा नित नूतन नित नवीन है। आप सभी संतजनो को सादर प्रणाम, जय जय सियाराम, जय-जय सियाराम जय-जय सियाराम |