इनके पद वंदन किये नासत विघ्न अनेक ||
जिनको माध्यम बनाकर हमें इस स्तर पर स्थापित किया उस मातृ, पितृ, गुरू के साथ ही परमात्मा के चरणों में सादर नमन सहित मैं सर्व प्रथम विनम्र अनुरोध करना चाहूंगा कि इस लेख में स्वयं का कुछ भी नहीं है, संतगण, सदगुरू एवं सद्ग्रंथी के आश्रय से इस मंदबुद्धि में जो ग्रहण हुआ, इस विषय पर रखने का प्रयास है :
अध्यात्म पथ के पथिकों को एकांत सेवन आवश्यक होने के साथ ही सांसारिक संबंध इसमें बन्धन कारक हैं, ऐसी सामान्य धारणा है। पतित पावनी गंगा जी के तीन स्वरूपों की चर्चा सत्संग में आती है, पहली जो प्रभु चरणों से निकलीं मां 'भागीरथी' दूसरी प्रभु वाणी के रूप में प्रगट हुई 'श्रीमद्भगवदगीता' जिसके विषय में कहा जाता है ' गीता गंगोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते तथा तीसरी गोस्वामी श्री तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस । मानस की दो चौपाइयां मानव जीवन की दुर्लभता एवं उद्देश्य को पुष्ट करती है।
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा, पायि न जेहि परलोक संवारा ।।
निश्चित ही प्रभु की अहैतुकी कृपा से चौरासी लाख योनियों में से मानव जीवन एक दुर्लभ उपहार के रूप में हमें प्राप्त है जिसमें भोग के साथ ही कर्म कर परलोक संवारने की भी छूट है। तनिक चिंतन करें तो यह पायेंगे कि प्रारब्धवश अर्जित पुण्य-पाप का भोग तो हमें प्रभु किसी भी योनि में जन्म देकर सुलभ करा देते किन्तु मानव जीवन प्रदान करना, उनकी परम कृपा का द्योतक है। जिस स्थान, परिवेश एवं जिनके बीच में हम पोषित हो रहे हैं उसका भी अदभुत रहस्य देने अथवा लेने का प्रारब्ध वश उसमें निहित है। अनुकूलता में व्यक्ति को सुख की अनुभूति होती है । यदि हमारी मनोवृत्ति स्वयं को सुख पहुंचाने की है तो व स्वार्थपरक, निन्दनीय होने के साथ ही बन्धन व मोहकारी होगी । थोड़ी गहराई से चिन्तन करें तो देखेंगे कि प्राप्त / अर्जित संपदा विषय, भोग, इस क्षणभंगुर परिवर्तनशील जगत में स्थायी तो रहेंगे नहीं और यदि रहते भी है तो क्या हम सदैव उन्हें भोगने के लायक रह पायेंगे? अवश्य उत्तर नहीं में ही आयेगा । संसार से वियोग होना ही है यही शाश्वत सत्य है । इस विषय में थोडा और विचार करेंगे तब पायेंगे कि जब संसार के विषय भोगों को भोगने में हम असमर्थ होंगे अथवा वियोग होगा तो निश्चित कष्ट की अनुभूति के साथ ही इन सबके चिंतन स्वरूप चौरासी लाख योनियों का चक्कर भी होगा। जीवन में कामनांए पूर्ण होने पर लोभ का और अधिक बढ़ना तय है तथा यदि वे पूरी न हो पायें तो क्रोध या दुःख का उत्पन्न होना स्वाभाविक है जो पतन का मार्ग भी प्रशस्त करता है । इस संबंध में श्री गीता जी का दर्शन करें :
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ।।
इसलिए कामनाओं को सबकी जड़ जानकर इसका सर्वथा त्याग ही श्रेयस्कर है। इसलिए अपने पुरूषार्थ कर्मों को करते समय यह भाव अच्छी तरह से बैठा लें कि यह शरीर दूसरों की सेवा के लिए प्रभु ने कृपा पूर्वक प्रदान किया है तथा जीव (आत्मा) परम पिता का अंश है, परमात्मा ही सिर्फ अपने है । इस संबंध में मानस में बताते है :
चेतन अमल सहज सुख रासी ।।
चितन में यह भी स्पष्ट होता है कि प्रकृति का अंश सदैव परिवर्तन प्राप्त करते हुए प्रकृति के साथ ही रहता है किन्तु जीवात्मा परमात्मा का अंश होते हुए भी प्रकृति के अंश को आत्मसात कर विभिन्न योनियों में भटकने हेतु विवश होता है । अन्य किसी योनि में कर्म करने की योग्यता नहीं है परन्तु मनुष्य जीवन में करने के साथ ही जानने की एवं मानने की शक्ति है । जानने में बुद्धि, विवेक के आश्रय ज्ञानार्जन, तर्क वितर्क की आवश्यकता होती है । मानने में आस्था, समर्पण के साथ ही त्याग की प्रधानता है। चूंकि कर्ममार्ग एवं ज्ञान मार्ग में फिसलन अधिक है इसलिए कलयुग में भक्ति मार्ग को उपयुक्त कहा जाता है | अतः इस जीवन में विवेक पूर्वक सद्गुरू के शरणागत हो जो भी सम्पदा प्रभु कृपा से प्राप्त है यथा पिता, पुत्र, पुत्री, पति, पत्नी आदि सभी स्वरूपों में अपने कर्तव्य पथ पर श्रेष्ठतम (100%) बिना किसी से तुलना किए हुए प्रदान करना चाहिए ताकि भौतिक जीवन की अच्छी दिशा प्रशस्त हो । मन में भाव आ सकता है कि जब सबकी सोच, कार्यशैली सकारात्मक होगी तभी जीवन कल्याणकारी होगा, मात्र एक व्यक्ति से परिवार अथवा समाज में क्या भला हो सकता है। इसका समाधान खोजने के बजाय हम स्वयं के अधीन सकारात्मक व्यवहार को मानस में उद्धृत चौपाई का दृढ़ आश्रय लेकर चलें तो निश्चित ही सुखद अनुभूति होगी:
जहां भी अपने संबध हैं उन संबंधों में "आदर्श" विशेषण युक्त हो जाये (आदर्शपिता, आदर्श पति आदि) इसका सचेष्ट रहकर प्रयास किया जाए। परन्तु यह तभी संभव है जब हम अपने अधिकारों की परवाह किए बिना अपनी कर्त्तव्यपरायणता पर आरूढ़ रहें। यदि किसी संबंध में कहीं अपमान, पीड़ा, अपयश अथवा तिरस्कार भी मिले तब भी उन्हें कैसे सुख मिले अपना सद्व्यवहार प्रदान करें, क्योंकि यह भी एक प्रकार की कसौटी है कि जब वो व्यक्ति अपना व्यवहार नहीं छोड़ पा रहा है तो मै । अपना सद्व्यवहार क्यो त्यागूं । इस प्रकार की सोच अन्तर्मन को सुख प्रदान करेगी ।
अंत में मुख्य सूत्र के रूप में मैं यही कहना चाहूंगा कि प्रभु ने हम सभी को परिवार / संसार में सेवा हेतु भेजा है तथा सिर्फ भगवान ही मेरे अपने है, सैदव इस भाव का स्मरण रखकर जीवन जीने का अभ्यास करना चाहिए । इस भाव से व्यवहार कर्म करने पर अपने सभी कर्म भगवान के काम, सबकी सेवा भगवान की सेवा यहां तक कि अपना कमाना, भोजन करना, सोना आदि सभी कार्य सेवा के सहयोगी कार्य होकर परमात्मा की आराधना के स्वतः अंश बना जाएंगे ।
