सनातन धर्म, विज्ञान और गुरु, ज्ञान

सनातन धर्म, विज्ञान और गुरु




सुश्री शिप्रा दीक्षित
लखनऊ (उ.प्र.)

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब सभी वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अत्यधिक महत्व देते है, सनातन धर्म की वैज्ञानिकता व प्रमाणिकता को समझना अत्यन्त सरल हो गया है । उदाहरणार्थ :

ब्लैक होल — जिसमें अत्यधिक गुरूत्वाकर्षण बल होने के कारण सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने अन्दर समाहित करने की क्षमता है । और सर्वविदित है : 'कर्षति आकर्षति इति कृष्णः' 'जो खीचता है आकर्षित करता है वह कृष्ण है ।' श्रीमद् भागवत् जी में श्री कृष्ण है ।' श्रीमद्भागवत जी में श्री कृष्ण ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अपने मुँह में माँ यशोदा जी को दिखाने की लीला की थी । गॉड पार्टिकल वह सूक्ष्मतम् कण जिसे ब्रह्माण्ड में सभी स्थानों पर उपस्थित बताया गया । हमें तो यह ज्ञान बहुत पहले ही प्राप्त हो चुका है:

अखण्ड मण्डालाकारं व्याप्तं येन चराचरं
तत् पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः

विचारणीय है कि इसे गुरू या गुरूत्वाकर्षण बल का नाम ही क्यों दिया गया ?

इसका एक उत्तर यह हो सकता है कि सर्वविदित है सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ऊर्जा से निर्मित है जिसे नष्ट नहीं किया जा सकता बस उसके रूप परिवर्तित किए जा सकते हैं। गुरूत्वाकर्षण बल : वह बल जिसके कारण यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड सुचारू रूप से संचालित हो रहा । आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में गुरूत्व अर्थात् गुरू के प्रति भाव सच्ची श्रद्धा । 'बल अर्थात् प्रेरणा' गुरू के प्रति श्रद्धा भाव हमें उस मार्ग पर चलने का बल एवं प्रेरणा प्रदान करता है जिस मार्ग पर चलते हुए हम उस परमसत्ता रूपी ब्रह्माण्डीय ऊर्जा से एकाकार हो जाते हैं जिसमें विलीन होने के पश्चात् जन्म मृत्यु रूपी चक्र से विमुक्त होकर मोक्ष अर्थात् मुक्ति की प्राप्ति होती है। गुरू की महिमा के व्याख्यान का सामर्थ्य तो किसी में भी नहीं है परन्तु अल्पज्ञान से इतना विदित है कि यह मार्ग सरल तो नहीं है पर उनके लिए दुलर्भ भी नहीं है जिन्हे गुरू कृपा और गुरूसान्निध्य प्राप्त हो । इसीलिए कहा गया है-

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूं पांय ।
बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो बताय ।।

हम सभी सौभाग्यशाली है जिन्हे इस घोर कलियुग में भी गुरू कृपा की प्राप्ति हुई है । गुरु जी के चरणारविन्दों में कोटि-कोटी प्रणाम और प्रभु से प्रार्थना कि हम सभी प्रभु सेवा परिवार के भक्तों को गुरूत्वाकर्षण बल अर्थात् गुरू जी की कृपा व आशीर्वाद निरन्तर प्राप्त होता रहे ।


।। गुरूकृपा हि केवल ।।

ज्ञान पर चिंतन




श्री बलदाऊ जी श्रीवास्तव
लखनऊ (उ.प्र.)

क्या आपने कभी एक बीज के अंदर देखा है कि उसमें (बीज में) कया है ? महर्षि उछालक और उनके पुत्र श्वेतकेतु की वार्ता

बीज अंदर से खाली है, लेकिन फिर भी भरा है! श्वेतकेतु ने कम से कम बारह वर्षों तक कला... विज्ञान... और धर्म... का अध्ययन किया और विश्वविद्यालय से स्त्रातक की उपाधि मिलने के साथ-साथ अपनी उत्कृष्टता के लिए विशेष सम्मान और हर संभव पुरस्कार प्राप्त करने पश्चात अपने घर लौटे । “बेटा तुमने विश्वविद्यालय में क्या सीखा?” श्वेतकेतु के पिता उछालक ने पूछा। “पिता जी, मैंने वहाँ वह सब कुछ सीखा जो सीखा जा सकता था। मैं बहुत खुश हूँ कि मेरे कारण आप गौरव का अनुभव कर रहे हैं।” श्वेतकेतु ने उत्तर दिया | इसके बाद उद्दालक ने कुछ भी नहीं कहा | लेकिन बेटे की बात सुनकर उन्हें अहसास हुआ कि उनके बेटे को अपने ज्ञान का अभिमान और घमंड होने लगा है और उनके बेटे को लगता है कि उसे सब कुछ आता है।

“पिताजी, आप क्या सोच रहे हैं? आप इतने चुप क्यों हैं?” श्वेतकेतु ने पूछा ।

उद्दालक ने उत्तर दिया, “मैं बस सोच रहा हूँ कि क्‍या तुम जानते हो कि अदृश्य को कैसे समझा जा सकता है?” “कैसे... कया?” श्वेतकेतु ने पूछा । उद्दालक ने कहा, “'तुमने मुझे अभी बताया कि तुमने वह सब कुछ सीखा है जो सीखा जा सकता था | लेकिन क्या तुम जानते हो कि नदी को पहाड़ों से समुद्र की ओर कौन ले जाता है? वाष्पीकरण, संघनन और बारिश का चक्र कौन बनाता हैं? और क्या तुम मुझे बता सकते हो, हर चीज का वास्तविक स्वरूप क्या है?”

श्वेतकेतु ने महसूस किया कि उसके पिता उसे कुछ बताने की कोशिश कर रहे थे, जो वह नहीं जानता | उद्दालक ने कहा, “जाओ बेटा और अंजीर के पेड़ की एक नई कटी हुई डाली मेरे पास ले आओ |” श्वेतकेतु फुर्ती से अंजीर की एक शाखा को काट कर-कर ले आया। जहाँ से वह शाखा कटी हुई थी, वह हिस्सा अभी भी गीला था | उद्दालक ने अपने बेटे श्वेतकेतु से पूछा, “इस शाखा से रस टपक रहा है। यह रस पेड़ को जमीन से पोषण लेने में सक्षम बनाता है। तो क्या डाल तोड़ने से अब वह पेड़ मर जाएगा?” उद्दालक ने आगे कहना जारी रखा, “नहीं, लेकिन अगर पेड़ की सभी शाखाओं से जीवन देने वाला रस निकाल लिया जाये, तो वह जल्द ही सूख जाता और फिर पेड़ मर जाता |” यह सब सुनकर श्वेतकेतु अपने पिता के प्रति सम्मान की एक नई भावना को महसूस करने लगा। जब श्वेतकेतु अपने पिता के साथ बात कर रहा था, उसी समय कुछ लोगों का एक समूह एक शव को लेकर श्मशान घाट की तरफ जा रहा था। उद्दालक ने देखा कि शव को देखकर उनका बेटा श्वेतकेतु परेशान-सा हो गया था | उद्दालक ने समझाया, “बेटा, जब कोई व्यक्ति मरता है, तो जीवन समाप्त नहीं होता, केवल शरीर ही नष्ट होता है|” “आपका क्‍या मतलब है, जीवन मरता नहीं है?” श्वेतकेतु ने पूछा | उद्दालक ने कहा, “ मैं समझाता हूँ। जो मर नहीं सकता वह आत्मा है। यह हमारे दिलों के अंदर है,” और हर जीवित और निर्जीव चीज में भी जो तुम अपने आस-पास देखते हो उसके अंदर भी यह मौजूद है। “आप किस बारे में बात कर रहे हैं, मैने कभी आत्मा को नहीं देखा पिताजी?” श्वेतकेतु ने आश्चर्य से पूछा | उद्दालक ने कहा, “अंजीर के पेड़ पर जो पका हुआ अंजीर लटका हुआ है उसे तोड़ कर के मेरे पास लाओं | इसे काटो और मुझे बताओ कि तुम इसके अंदर क्या देखते हो?” “'पिताजी, मुझे बहुत सारे छोटे बीज दिखाई दे रहे हैं ।” श्वेतकेतु ने उत्तर दिया। उद्दालक ने कहा, “उन छोटे बीजों में से एक को आधा काटो और मुझे बताओं कि तुम उस बीज के अंदर क्या देखते हो?” “अंदर कुछ भी नहीं है!” श्वेतकेतु हैरान रह गया | उद्दालक ने कहा, “इस बीज के अंदर कुछ भी नही है, लेकिन इस बीज से अंजीर का पेड़ उगाया जा सकता है |”

“बीज में शून्यता का सार ही उसका चरम अस्तित्व है। ”

“लेकिन जब हम सार को देख नहीं सकते हैं, तो हम कैसे कह सकते हैं कि वह मौजूद है?” श्वेतकेतु ने आश्चर्य से पूछा | उसे भीतर ही भीतर अहसास होने लगा कि वह बहुत कुछ नहीं जानता है! उद्दालक ने अपने पुत्र से कहा, “मैं तुम्हें समझाता हूँ। नदी से एक गिलास पानी भरो और फिर उस पानी में थोड़ा नमक डाल दो और फिर कल सुबह मेरे पास वह पानी का गिलास ले कर आना।” श्वेतकेतु ने वह सब किया जो उसके पिता ने उसे करने का निर्देश दिया था |

अगली सुबह, उद्दालक ने श्वेतकेतु से वह गिलास गिलास लिया और पूछा, “तो, अब बताओ नमक कहाँ है?” “हम इसे नहीं देख सकते । यह पानी में घुल गया है।” श्वेतकेतु ने उत्तर दिया “तुम सही कह रहे हो | इस पानी का स्वाद चखो ।” उद्दालक ने कहा । श्वेतकेतु ने गिलास से एक घूंट पानी पिया और कहा, “ओह, यह नमकीन है, पिताजी” उद्दालक ने कहा, “तुम पानी में नमक नहीं देख सकते लेकिन वह उस पानी के अंदर मौजूद हैं। वेसे ही हम बीज के अंदर जीवन का सार या अस्तित्व नहीं देख पा रहे हैं। लेकिन वह उस बीज के अंदर मौजूद है।” उन्होंने जारी रखा, “जीवन के सार को आत्मा कहा जाता है, हमारे भीतर भी आत्मा, जीवन के मूल तत्व के रूप में विद्यमान है, श्वेतकेतु |”

आँखों में आँसू लिए श्वेतकेतु ने प्रणाम किया और पिता से आशीर्वाद मांगा । श्वेतकेतु को समझ आ गया था कि कोई भी शास्त्र उन्हें यह ज्ञान नहीं दे सकता था । श्वेतकेतु ने कहा, “पिताजी मैं आपको कितना भी धन्यवाद दूँ वह सब इस ज्ञान के आगे कुछ भी नहीं है। आपने मुझे उस ज्ञान को हासिल करने में मदद की है जो अज्ञात को ज्ञात बनाता है, अदृश्य को दृश्य बनाता है और अकल्पनीय को समझने योग्य बनाता है।” श्वेतकेतु ने कहा अपने पिता के साथ इस खूबसूरत अनुभव के बाद, श्वेतकेतु आगे चल कर खुद एक महान ऋषि बन गए ।

कुछ रिश्ते बहुत पवित्र होते हैं। वे जीवन पर एक शक्तिशाली प्रभाव छोड़ते हैं। कुछ रिश्ते बहुत ही शाश्वत होते हैं। कुछ रिश्ते इतने गहरे होते हैं कि वे रिश्तों के नियमों को भी चुनौती दे सकते हैं। इस कहानी में, एक पिता और पुत्र के बीच की बातचीत को उनके पवित्र रिश्ते के कारण लंबे समय तक याद किया जाता रहेगा |

इस तरह के मार्मिक सम्बंध सर्वोत्तम ज्ञान सिखाने में मदद कर सकते हैं | वृक्ष बीज के भीतर की शून्यता से निकलता है। क्या ब्रह्मांड भी शून्यता से उत्पन्न हुआ है? ऐसे प्रश्नों का कोई निश्चित उत्तर नहीं है, हालांकि हम विज्ञान और सूचना के दायरे से परे सोचने की कोशिश कर सकते है।

दास ... अपने ऋषियों द्वारा गूढ़ विषयों को इतनी सरलता से समझाने के कौशल से अति प्रभावित है |... दास इसी प्रकार के कौशल को श्रद्धेय रमेश भाई शुक्ल ...... गुरूदेव में देखकर... पाकर इस जीवन की सार्थकता को फलीभूत करने में लगा हुआ है

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ।।


प्रभु सेवा परिवार


( इंडिया ट्रस्ट एक्ट, 1882 के तहत निगमित एक
धार्मिक ट्रस्ट पंजिकरण संख्या 1537 /2021)