सदगुरू व्यक्ति नहीं, तत्व होता है । प्रत्येक व्यक्ति की सफलता के पीछे किसी सद्गुरू का ही हाथ होता है । सद्गुरू ईश्वर से भी महान होता है । सद्गुरू के मार्गदर्शन से ही मनुष्य सफलता प्राप्त करता है । जो सद्गुरू के मार्गदर्शन से चलता है, उसे जीवन में कभी ठोकरे नहीं खानी पड़ती हैं। मध्य प्रदेश के पन्ना जनपद में अगत्स्य मुनि का आश्रम है, जिसे सिद्धनाथ आश्रम के नाम से जाना जाता है। एक बार अगत्स्य मुनि आश्रम की देख-रेख का उत्तरदायित्व अपने शिष्य सुतीक्ष्ण जी को सौंप कर कुछ दिनों के लिये तीर्थाटन पर चले गयें ।
मुनि अगस्तिकर शिष्य सुजाना । नाम सुतीछन रति भगवाना ।।
सुतीक्ष्ण जी आश्रम की देख-रेख में लग गयें । आश्रम का भ्रमणर करने हेतु सुतीक्ष्ण जी जैसे ही चले, तो सोचने लगे कि साथ में ठाकुर जी ( शालिग्राम) को भी ले चलें घुमा लाऊँगा । आश्रम मे सरोवर के किनारे एक जामुन का पेड़ था। बालक बुद्धि सुतीक्ष्ण की जामुन खाने की इच्छा हुई। जामुन का विशाल वृक्ष था। आव देखा न ताव, ठाकुर जी को लेकर जामुन तोड़ने लगे। जैसे बालक पत्थर मार-मार कर फल तोड़ते है न, वैसे ही सुतीक्ष्ण ने जामुन तोड़ने के लिये ठाकुर जी को ही उछाल दिया। किन्तु जिसको भगवान के चरणों में प्रेम हो गया हो, जिसें भगवान की भक्ति मिल गयी हो उसके मन में छोटी-छोटी कामनायें आ जाये न तो फिर भक्ति चली जाती है:–
बिनु सन्तोष न काम नसाहीं । काम अछत सुख सपनेहुँ नाही ।।
ठाकुर जी की सेवा मिल गई, सन्तों का सानिध्य मिल गया, सन्त भी अगत्स्य मुनि जैसा, लेकिन जामुन पाने की छोटी सी कामना । अब जामुन तो दो-चार नीचे आ गई लेकिन ठाकुर जी सरोवर में चले गये । सुतीक्षण जी को अब जामुन अच्छी नही लग रही। सोच रहे है, है परमात्मा अब गुरु जी आयेंगे, तो जवाब क्या दूँगा । सुतीक्ष्ण जी ने सोचा तब तक बचने का कोई उपाय किया जाये। उन्होने एक बड़ी सी जामुन ठाकुर जी के सिहांसन पर रख दी। गुरूजी (अगत्स्य मुनि) आये तो देखा ठाकुर जी तो बहुत चमक रहें हैं। थोड़ा दूर से देखा, आवाज लगाई, सुतीक्ष्ण ने कहा ठाकुर जी की मन से सेवा की है न ? गुरू जी सोच रहे हैं मेरा पूरा जीवन ही निकल गया लेकिन ठाकुर जी में ऐसी चमक कभी नहीं आई। मन नहीं माना और पास से देखने के लिये गयें। जैसे ही ठाकुर जी को उठाया, ठाकुर जी उगलियाँ घुस गई, क्योंकि तीन दिन में जामुन अन्दर से सड़ गई । गुरू जी को क्रोध आया, बोले मेरे ठाकुर जी कहाँ है? सुतिक्ष्ण जी बोले वह बैठे तो है चमक रहे ी गल कैसे गये। सुतीक्ष्ण ने कहा, गर्मी का समय है, आपने कहा था। अच्छी सेवा करना। खूब सेवा की।
पुनि-पुनि चन्दन पुनि पुनि पानी । ठाकुर गल गये हम का जानी ।।
गुरू जी (अगत्स्य) ने कहा इसी वक्त मेरे आश्रम से बाहर निकल जाओ। सुतीक्ष्ण जी ने गुरू जी से कोई तर्क-वितर्क नहीं किया, कोई सफाई नहीं दी आँखों में आँसू भर आये । सुतीक्ष्ण जी बोले, गुरू जी, मुझे वापस कब आना है ? गुरू जी ने कहा, जब मेरे ठाकुर जी को साथ लाना, उसी दिन आश्रम में आना, नहीं तो मुँह मत दिखाना । सुतीक्ष्ण ने कहा ठीक है और रोते हुये आश्रम से बाहर चले गये । सन्त और ये जो सद्गुरू होते है न, ये शिष्य की सारी कामनाओं का नाश करते है ।। तभी तो कहते हैं कि :-
गुरुर्ब्रह्मा गुरुविष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः
गुरूर्साक्षात परम् ब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः
गुरू के चार मुँह तो हैं नही, फिर ब्रह्मा, कैसे, गुरू के चार भुजाये तो है नही, फिर चतुर्भुज श्री हरि विष्णु कैसे, गुरू के पाँच मुँह तो है नही, फिर शंकर (महादेव) कैसे ? ये जो सदगुरू होते हैं न ये हमारे अन्तःकरण में सद्गुणों की सृष्टि करते हैं, इसलिये ब्रह्मा है, क्योकि ब्रह्मा का काम है सृजन करना । श्री हरि विष्णु का काम है सृष्टि का पालन-पोषण करना । सद्गुरू हमारे अन्तःकरण में सद्गुणों का पोषण करतें हैं इसलिए सद्गुरू श्री हरि विष्णु है। गुरू महेश्वर कैसे है, महेश्वर तो संहार करते है। सद्गुरू भी हमारे अन्तःकरण के दुर्गुणों का नाश करते हैं, संहार करते है, इसलिये सद्गुरू महादेव भी हैं जैसे खेत में किसान फसल की निराई करके खर-पतवार निकाल कर फसल की रक्षा करते हैं, वैसे ही सद्गुरू भी अपने शिष्य के, भक्त के अन्तःकरण के विकारों को, दुर्गुणों को नष्ट करके सद्गुणों का पोषण करते है । अगत्स्य जी ने देखा कि अभी शिष्य (सुतीक्ष्ण) के अन्तःकरण में तुच्छ सी कामना नष्ट नहीं हुई है, जब तक हम अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं करेंगे, तब तक परमात्मा मिलने वाला नहीं है । सद्गुरू भी किसान की तरह अपने शिष्य के अन्तःकरण की निराई करते हैं :- कृषि निरावहिं चतुर किसाना । जिमि बुध तजहिं मोह मद माना । चतुर किसान जैसे अपनी फसल की निराई करते है, विवेकी / बुद्धिमान लोग उसी प्रकार मोह, मद, मान की निराई करके सद्गुणो को पोषण करते है। सद्गुरू अपने शिष्य के अन्तःकरण की निराई करते हैं ।
गुरु जी कहते है कि ये काम करना है, ये काम नहीं करना है, कुछ कामों का जबर्दस्ती करवाते हैं, कुछ काम जबरदस्ती छोड़वाते हैं। लेकिन जिन कामों को गुरूजी छोड़वाते हैं, उनके बारे में हमें
भविष्य में पता चलता है कि गुरू जी ने हमसे ये कार्य क्यों छोड़वाये | सद्गुरू परमब्रह्म है, क्योकि जब हम बिना सद्गुरू के साधना / भक्ति करते हैं, तो उसका दुष्प्रभाव होता है और अच्छा परिणाम तो सद्गुरू के मार्गदर्शन से ही सम्भव है । अस बर प्रभु कबहुँ न जाँचा, समुझि न परै झूठ का साँचा सद्गुरू वैद बचन विश्वास संजम यह न विषय कै आसा । गृहस्थ आश्रम सबसे बड़ा है, लेकिन नियम से नहीं रहे तो फिर गृहस्थ जीवन विनाश का कारण बन जायेगा । इसलिये सद्गुरू का मार्गदर्शन अत्यन्त आवश्यक है। सुतीक्ष्ण जी को गुरू जी ( अगत्स्य मुनि) ने आश्रम से इसीलिये निकाला कि इतनी अच्छी भक्ति होने के बाद भी, दिन रात सत्संग मिलने के बाद भी, उनकी छोटी सी कामना के कारण ठाकुर जी (शालिग्राम) सरोवर में चले गये । अब सुतीक्ष्ण जी मन, कर्म और वचन से भगवान की भक्ति कर रहे है:-
मन क्रम वचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक ||
श्री राम जी अत्रि मुनि के आश्रम से पंचवटी की ओर जा रहे थे, श्री राम जी को याद आया कि सुतीक्ष्ण को दर्शन दे दें। सुतीक्ष्ण को सूचना मिली कि भगवान ( ठाकुर जी ) आ रहे हैं । सुतीक्ष्ण जी व्याकुल हो उठे कि मैनें जप, तप, साधना कुछ नही किया, न ही मेरे जीवन मे ज्ञान, भक्ति, वैराग्य है, पता नही भगवान मुझे दर्शन देंगें या नही । अब विधाता से प्रार्थना कर रहें हैं ।
हे विधि दीन बन्धु रघुराया । मो से सठ पर करिहहि दाया ।।
नहिं सत्संग जोग जग जागा । नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा ।।
दिसि अरू विदिसि पंथ नहि सूझा । को मैं चलउँ कहाँ नहिं बूझा | |
कबहुँक फिरि पाछे पुनि जाई । कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई ।।
सुतीक्ष्ण जी कभी आगे जाते है, कभी पीछे जाते है, कभी नृत्य करते है । भगवान कहते हैं कि मेरे भक्त की बातें करते-करते वाणी रूक जाती है, कभी रोने लगता है, कभी हँसने लगता है, कभी लाज, शर्म छोड़ कर नाचने लग जाता है, ऐसा मेरा भक्त अपनी भक्ति से तीनो लोको को पवित्र कर देता है । मम गुण गावत पुलक सरीरा । गदगद गिरा नयन बह नीरा ।। यही हालत सुतीक्ष्ण जी की हो गई है। बीच रास्ते में आँखे बन्द करके बैठ गये । भगवान ने आवाज लगाई, लेकिन सुतीक्ष्ण ने आँखे नहीं खोली । ध्यान कर रहे है श्री राजा राम जी की छवि का । भगवान ने अपनी छवि हटा कर सुतीक्ष्ण के हृदय में चतुर्भुज रूप की छवि प्रकट कर दी-
भूप रूप तब राम दुरावा । हृदय चतुर्भुज रूप देखावा ।।
मुनि अकुलाई उठा तब कैसे । बिकल हीन मनि फनिबर जैसे ||
सुतीक्ष्ण जी ने हड़बड़ा कर आंखे खोल दी, देखा श्री राम, लक्ष्मण, सीता तीनों सामने खड़े हैं। राम जी ने कहा कुछ मांग लो । सुतीक्ष्ण जी ने माँगा -
अस अभिमान जाई मन मोरें । मैं सेवक, रघुपति पति मोरे ।।
अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम । मम हिय गगन इन्दु इव बसहु सदा निहकाम ।।
सुतीक्ष्ण जी ने कहा, भगवन आप यहाँ से कहाँ जायेगे। श्री राम ने कहा, मुझे अगत्स्य मुनि के यहाँ जाना है । सुतीक्ष्ण बोले मैं भी साथ चलूँ । क्योंकि मुझे गुरूजी के दर्शन बहुत दिनों से नही हुये । श्रीराम ने कहाँ “ एवमस्तु" ।
एवमस्तु करि रमा निवासा, हरसि चलें कुंभज रिसि पासा ।।
बहुत दिवस गुर दरसन पाएँ । भए मोहि एहि आश्रम आए । ।
सुतीक्ष्ण जी दौड़कर गुरू जी के पास गये कहा गुरूदेव, श्रीराम, लक्ष्मण सीता आये है । " तुरंत सुतीछन गुरु पहिं गयऊ, करि दंडवत कहत अस भयऊ" नाथ कोसलाधीस कुमारा आए मिलन जगत आधारा ।।
राम अनुज समेत वैदेही, निसि दिनु देव जपत हहु देही ।
सदगुरू भविष्य के ज्ञाता होते है, सदगुरू सबसे कोमल एवं करूणावान होते हैं । सदगुरू करूणा के सागर होते है । सुतीक्ष्ण ने गुरू जी को कहा, आपने कहा था ना कि जिस दिन ठाकुर जी (भगवान) को लेकर आओगे, तभी आश्रम में आना। गुरूजी ने सुतीक्ष्ण को गले से लगा लिया ।
इस प्रकार स्पष्ट है, कि सदगुरू का क्रोध में दिया गया बचन भी शिष्य के प्रति कल्याणकारी, कृपा और करूणा से भरा होता है। इसलिए बिना किसी तर्क-वितर्क के सद्गुरू के बचनों को शिरोधार्य करना चाहिये ।
परमपूज्य श्री गुरूदेव की कृपा से ही मुझे, चित्रकूट धाम उत्तराखण्ड के चारों धाम, दक्षिण यात्रा में श्री मल्लिकार्जुन, श्री तिरूपति बाला जी, श्री रामेश्वरम् तथा श्री अयोध्या धाम आदि विभिन्न स्थानों का दर्शन लाभ प्राप्त हुआ । और मैं कह सकता हूँ कि :-
एहि सम मोहि अनुभयउ न दुजे । सब पायडे रज पावन पूजे ।।
बदउं गुर पद कंज कृपा सिन्धु नर रूपहरि । महा मोह तम पुंज जासु बचन रविकर निकर ।।
(सन्तो के प्रवचनों एवं कथओं से संकलित )